Saturday, January 15

ताजमहल सिर्फ अमीरों के लिए!

जिस प्रेम के बेमिसाल प्रतीक ताजमहल को देखकर दुनिया भर के प्रेमी युगल कई जन्मो तक साथ-साथ जीने-मरने की कसमें खाते रहे हैं, उसे सिर्फ रईसों के लिए सीमित करने की वकालत की जा रही है।

ब्रिटेन की प्रतिष्ठित फ्यूचर लेबोरेटरी के एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि भारत में ताजमहल, मिस्र के पिरामिड और वेनिस को धनी वर्ग के लिए खेल का विशेष मैदान बना दिया जाना चाहिए ताकि उन्हें संरक्षित किया जा सके।

उसने चेतावनी दी कि इन विश्व विरासत स्थलों को बचाने के लिए यदि यह कार्रवाई नहीं की गई तो पर्यटन के भारी दबाव के कारण हम अगले 20 वर्षों में इसे खो देंगे।

‘डेली एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक ये विश्व विरासतें केवल धनी लोगों के लिए सीमित की जानी चाहिए और आम पर्यटकों के देखने के लिए अलग से एक प्लेटफार्म बनाया जाना चाहिए।

भविष्यवेत्ता लॉन पियर्सन ने कहा कि भविष्य में हम जहाँ चाहते हैं वहाँ नहीं जा सकेंगे। आने वाले समय में पर्यटन की सुविधाएँ कुछ स्थलों पर होंगी और केवल धनी और प्रसिद्ध व्यक्ति ही इन पर्यटन स्थलों का टिकट खरीद पाएँगे। (भाषा)

आस्था से जुड़ी मकर संक्रांति


मराठी में यह एक प्यार भरा निवेदन है, जिसका अर्थ है तिल-गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो, तिल-गुड़ फेंकना नहीं और हमसे लड़ना नहीं। यही प्यार भरा संदेश हमारी संस्कृति में भी रचा-बसा है।

भारतीय त्योहार सदैव एकजुटता व परस्पर प्रेम के द्योतक हैं। मकर संक्रांति पर्व भी ऐसे ही स्नेह व श्रद्धा से हर प्रांत व जाति द्वारा मनाए जाने वाला त्योहार है। यह ऊर्जा के स्रोत सूर्य की आराधना के पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। सूर्य की दक्षिणायन से उत्तरायन की ओर गति प्रारंभ होती है, जिससे मौसम में परिवर्तन के साथ-साथ रातें छोटी व दिन तिल के आकार में बढ़ने लगते हैं। यह सृष्टि के अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का प्रतीक है।

विभिन्ना प्रांतों में यह त्योहार थोड़े भिन्न अंदाज व नामों से मनाया जाता है, लेकिन सबका मूल एक-सा ही है। तमिलनाडु में पोंगल, महाराष्ट्र में तिल संक्रांति, पंजाब में लोहड़ी, गुजरात में उत्तरायन, असम में माघ-बिहू और राजस्थान में तो यह पतंग उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस पतंग उत्सव में देश से ही नहीं वरन विदेशी भी दूर-दूर से आकर प्रतियोगिता में भाग लेते हैं।

कई स्थानों पर इस दिन लोग मिल-जुलकर गिल्ली-डंडा व पतंगबाजी जैसे आयोजन करते हैं। रंग-बिरंगी पतंगें आसमान की ऊँचाई नापने के साथ, हवा में उड़ती, गोते लगातीं मानो सपनों को छू लेती हैं। जितना आनंद पतंग उड़ाने का उतना ही उसे काटने, पेंच लड़ाने व लूटने में आता है। एक तरह से यह त्योहार ऊँचाइयों को छूने का, गिले-शिकवे दूर कर एक हो जाने का भी है।

आनंद व उल्लास के साथ मकर संक्रांति के दिन जप, तप, दान, स्नान आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। कहते हैं इस समय किया गया दान सौ गुना बढ़कर प्राप्त होता है। महिलाएँ इस दिन सौभाग्य-सूचक वस्तुएँ, तिल-गुड़, रोली और हल्दी बाँटती हैं। पवित्र नदी में ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर सूर्य को अर्ध्य देना, गाय को चारा खिलाने व खिचड़ी तथा तिल-गुड़ का दान शास्त्रों के अनुसार विशेष फलदायी होता है। 

मकर संक्रांति के दिन तिल से बने व्यंजनों का सेवन सेहत के लिए भी बहुत उपयोगी होता है। तिल का गुड़ के साथ सेवन करने से इसकी पौष्टिकता बढ़ जाती है। साल की शुरुआत में तिल का सेवन पूरे साल निरोगी रखता है। आइए, प्रार्थना करें कि यह मधुर पर्व सबके जीवन में नई उमंग व उम्मीदों का सवेरा लाए। उत्तरायन का सूर्य अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए नई संभावनाओं के साथ।



Thursday, January 13

लोकतंत्र के चौथे खम्बे को बचाओ

जागरूक मीडिया एवं खोजी पत्रकारिता आज हर प्रकार के अन्याय एवं शोषण के विरूद्ध जनसाधारण की आवाज बनकर उभरा है. किन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि चहुंओर भ्रष्टाचार से त्रस्त व्यक्ति का यही रक्षाकवच गली गुण्डा प्रकार के मूल्यहीन भटके युवाओं की जमात के हाथ में पैसा वसूली तथा अन्यान्य शोषण का एक नया हथियार भी बन गया है|
छोटे छोटे शहरों कस्बों में बाहुबल से हफ्ता वसूली वाले गुण्डों, गली गली में सक्रिय छुटभैये नेता और पुलिस का पुराना गठजोड़, चाकू की नोक पर परीक्षा पास करके जुगाड़ू डिग्रीधारक गुन्डों की नयी जमात में तब्दील हो चुका है.... हाथ में माइक और कोई छोटा मोटा वीडियो कैमरा.... इनका यही स्वरूप है. पैसा कमाने और धौंस जमाने की नयी व्यवस्था तैयार है... . वरिष्ठ पत्रकार के नाम पर पर्दे के पीछे से अनजान चेहरा किसी फ़िल्मी पटकथा के छिपे चेहरे वाले खलनायक की भांति..... साप्ताहिक खर्चे के लिये पैसों का जुगाड़ करने के लिये अपने चेलों चपाटों को निर्देशित करता है. यह वह व्यक्ति है जो इन्हें संचालित करता है. और यह शिष्य लोग सारा दिन स्कूप के नाम पर सब्जी ठेल वालों तक से “लाइसेंस दिखाओ नहीं तो तुम्हारी न्यूज चैनल पर आ जायेगी..” नासमझ किसी अनजाने भय के वशीभूत हो ले देकर मामला सुलट लेने के लिये तैयार हो जाता है. कभी किसी पार्क में गर्ल फ्रेंड के साथ बैठा कोई युवक घरवलों के भय से समझौता करने को तत्पर हो जाता है. कोई बड़ी पार्टी हाथ आये या फिर कोई तगड़ा स्कूप हाथ लगा तब तो वारे न्यारे...| मीडिया को वही खबर प्रेषित होती है जब कोई इसके लिये तैयार नहीं होता| विषय की गुणवत्ता विचारे बिना सनसनीखेज खबर के नाम पर कई बार महत्वहीन विषय भी किसी न किसी चैनल की खबर बन जाते हैं|
सुबह शाम जहां भी चांस लगा ... लोगों का भयादोहन कर पैसे ऐंठने की नयी व्यवस्था तैयार हो चुकी है.... पहले वाले हथियार के बल पर लोगों को डरा धमका कर लूटते थे तो अपराधिक मामलों में धरे भी जाते थे. परन्तु इन नये कैमरे वाले गुन्डों को तो इसका कोई भय नहीं है. यदि इनसे पूछा जाता है कि भाई अपने चैनल का नाम बताओ तो भाग लेते हैं अथवा किसी न किसी अनजान चैनल का नाम बताकर डरा लेते हैं. इनका परिचय पत्र मांगने अथवा दिखाने की बात पर उलटा जबाब “.... अबे तू क्या मेरी डिग्री देखेगा”। अब कस्बे और जिला स्तर पर प्रत्येक व्यक्ति तो नियम कानून की समुचित जानकारी नहीं रखता. फिर मीडिया के डर से पुलिस भी इन लोगों से कोई पंगा लेने से डरती है. एक आकलन यह भी है कि स्थानीय एवं राजनीतिज्ञों से मिली भगत के आधार पर ही पैसा वसूली का यह एक नया संगठित ढांचा तैयार हुआ है. मीडिया चैनलों द्वारा स्ट्रिंगर के नाम पर चलने वाली यह व्यवस्था पत्रकारिता के स्थापित मापदण्डों की वास्तविकता से बहुत परे है. व्यक्तिगत रूप से यह लोग कई बार संगठित रूप से हफ्ता वसूली के एजेंट जैसी स्थिति में संलिप्त होकर समाज के सामने एक नयी समस्या खड़ी कर रहे हैं. खोजी पत्रकारिता एवं जागरूक मीडिया के पहरेदारों को इन स्वपोषी अति उत्साही स्वार्थी तत्वों से तत्काल सचेत होने की आवश्यकता है.

Wednesday, January 12




फिल्में भडकाती हैं बच्चों में आक्रोश  


फिल्में लोगों के मनोरंजन के लिए बनाई जाती हैं लेकिन दुख की बात यह है कि फिल्में अपने इस उद्देश्य को पूरा कर पाने में पूरी तरह सक्षम नहीं हैं। आजकल फिल्मों में बहुत अधिक हिंसा दिखाई जाती है, इस वजह से दर्शकों की रुचि भी विकृत हो चुकी है। खास तौर से बच्चे फिल्मों में दिखाई जाने वाली हिंसा पर ही सबसे ज्यादा ध्यान देते हैं। उनके अवचेतन मन में हीरो की परदे पर दिखने वाली छवि ही अंकित होती है। वे उन्हीं की तरह बनना चाहते हैं। फिल्में बच्चों के मन में दबे आक्रोश को और अधिक भडकाने का काम करती हैं। बच्चों का यह आक्रोश जब बाहर फूटता है तो कभी-कभी वे अपने दोस्तों के साथ आक्रामक और हिंसक व्यवहार कर बैठते हैं। बच्चों के व्यक्तित्व और चरित्र के निर्माण में फिल्में निश्चित रूप से अपना गहरा प्रभाव डालती हैं। टीनएजर और युवा वर्ग पर भी फिल्मों का नकारात्मक प्रभाव पडता है। टीनएजर फिल्मों में दिखाई जाने वाली हर बात को सही मान लेते हैं और उसी का अनुसरण करने लगते हैं। समाज में बढती हिंसा और अपराध के लिए कहीं न कहीं फिल्में जिम्मेदार हैं। फिल्म उद्योग से जुडे लोग अकसर यह तर्क देते हैं कि फिल्में देखकर लोग हिंसा नहीं करते बल्कि समाज में जो होता है हम उसी की सच्चाई बयान करते हैं। लेकिन उनका यह तर्क बिलकुल गलत है। ऐसा नहीं है कि समाज में केवल हिंसा और नकारात्मक बातें ही होती हैं। कई अच्छे कार्य भी समाज में हो रहे हैं, जिनसे सभी को प्रेरणा मिल सकती है। उन अच्छे कार्यो को भी फिल्मों के माध्यम से लोगों के सामने लाया जा सकता है। फिल्म निश्चित रूप से अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है और इसका इस्तेमाल सकारात्मक उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए।

Sunday, January 9

सीढ़ियों वाली बस्तियां.....

हम सिर्फ झुग्गियों को उजाड़ने की ही ख़बरें पढ़ते-सुनते रहते हैं। कुछ अमीर लोग झुग्गियों पर उनकी शहरनुमा खूबसूरत बीबी के चेहरे पर दाग़ समझते हैं। कुछ को बिल्डर और राजनेताओं के गठजोड़ से पैदा हुई नाजायज़ औलाद नज़र आती हैं झुग्गियां।दिल्ली के बादली गांव के जे जे क्लस्टर गया था। आशियाना और गंदगी का मणिकांचन योग दिखा। सरकार और निगम ने नाली की निकासी का कोई इंतज़ाम नहीं किया है। बिजली आई है। झुग्गियों की आबादी बढ़ी है दो कारण से। एक तो पहले के परिवार बड़े हुए हैं और दूसरे गरीब प्रवासी मज़दूरों का बड़ी संख्या में आना हुआ है। यहां भी किराया सिस्टम आया है। सारी झुग्गियां अब दुछत्ती हो रही हैं। सीढ़ी बनाने के लिए पैसा और जगह दोनों नहीं हैं। इसलिए प्रवासी किरायेदार मज़दूर या परिवार के लोग सीढ़ियों के ज़रिये ऊपर जाकर रहते हैं। सारे मकान एक दूसरे की बोझ से दबे हैं और टिके हैं।
एक तस्वीर में आप देखेंगे कि कैसे रास्ते के बीच में ऊपर एक कमरा बनाया गया है। हर घर के बाहर एक बांस की सीढ़ी आपको दिखेगी। कुछ घरों में रंगाई और टाइल्स भी नज़र आए। वो इसलिए कि इमारती मज़दूर बचे हुए सामानों से अपने घरों को सुन्दर बनाने की कोशिश कर लेते हैं। थ। ज़मीन पर जगह नहीं है इसलिए छत का कई प्रकार से इस्तमाल हो रहा है। यहां की औरतें जिन मेमसाहबों के यहां काम करती हैं उनके बच्चे के छोड़े टूटे खिलौने,कुर्सियां और चादर वगैरह से लगता है कि यहां का स्तर बढ़ा होगा। कुछ मेमसाहबों की पुरानी साड़ियों में बनी-ठनी नज़र आती हैं। सारी औरतें कामगार हैं,अथाह परिश्रम करती हैं और उस अनुपात में पौष्टिक आहार नहीं मिलता इसलिए इन बस्तियोंमें ज्यादातर औरतें छरहरी दिखेंगी। लेकिन सब किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त हैं।...

DEEPIKA

Friday, January 7

दिल्ली में दिख गई ढेंकी.....

दिल्ली में दिख गई ढेंकी कभी-कभी घूमते-घूमते ग़ज़ब का अनुभव हो जाता है। बवाना की पुनर्वास कालोनी में ढेंकी केदर्शन हो गए। दिल्ली में ढेंकी के दर्शन हो जायेंगे कभी सोचा नहीं था। कुछ महीने पहले चंद्रभान प्रसाद कह रहे थे कि गांवों से जांता और ढेंकी ग़ायब हो चुके हैं। जांता पर गेहूं और चना पीसा जाता था। बल्कि पीसने की जगह दरने का इस्तमाल होता था। ढेंकी से धान की कूटाई होती थी। धीरे-धीरे। वक्त लंबा होता था तो औरतों ने ढेंकी कुटने के वक्त का संगीत भी रच डाला था। मेरी चचेरी बहन,फुआ और बड़ी मां को खूब गाते देखा है। हम भी जब उधर से गुज़रे तो दस पांच बार ढेंकी चला लिया करते थे। ढेंकी से निकलती चरचराहट की आवाज़ गांव घरों में दोपहर के वक्त के सन्नाटे को अपने तरीके से चीरा करती थी। हालांकि ढेंकी और जाता पूरी तरह से ग़ायब नहीं हुए हैं मगर गांवों में कम दिखने लगे हैं। मशीन की कूटाई-पिसाई ने न जाने कितने सैंकड़ों साल पुरानी इसतकनीक को ग़ायब कर दिया। ग़नीमत है समाप्त नहीं हो पाई ढेंकी। हम सोचते रहे कि दिल्ली जैसे महानगर में ढेंकीजाता का बात कौन करेगा। मगर महानगर में ढेंकी को देखकर ऐसे लगा जैसे बवाना में डायनासोर देख लिया या फिर अजगर निकल कर किसी के बिस्तरे पर आ गया हो। हैरानी। तीन चार लड़कियां उसी मस्त अंदाज़ मेंझूमते हुए चावल कूट रही थीं। अब यही से विश्लेषण सामाजिक टाइप होने लगता है। कई संस्कृतियों वाली पुनर्वास कालोनी में एक पुरानी तकनीक का जगह बनाना। कूटने वाली महिलाएं बांग्ला बोल रही थीं।कूट रही थीं चावल। धान नहीं। महिला ने बताया कि पचास किलो चावल पीसने में तीन घंटे लग जाते हैं। पीसे हुए चावल से वो बस्ती में इडली डोसा बेचती है। हद हो गई। कॉकटेल की। बंगाली औरतें,उत्तर भारतीय ढेंकी और कूटाई-पिसाई दक्षिण भारतीय व्यंजन के लिए। बंगाल में भी ढेंकी का इस्तमाल होता रहा है। बांग्ला में इसका कुछ नाम था जो मैं लिखते वक्त भूल गया। क्या पता यह टेक्नॉलजी पूरे भारत में ही हो। बल्कि होगी ही। बहुत आनंद आया इस ढेंकी को देखकर।
DEEPIKA

मैं और मेरी हिंदी

हिंदी अब भारत मात्र की भाषा नहीं है... नेताओं की बेईमानी के बाद भी प्रभु की कृपा से हिंदी विश्व भाषा है. हिंदी के महत्त्व को न स्वीकारना ऐसा ही है जैसे कोई आँख बंद कर सूर्य के महत्त्व को न माने. अनेक तमिलभाषी हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यकार हैं. तमिलनाडु के विश्वविद्यालयों में हिन्दी में प्रति वर्ष सैंकड़ों छात्र एम्.ए. और अनेक पीएच. डी. कर रहे हैं. हिन्दी भाषी प्रदेश में आकर लाखों तमिलभाषी हिन्दी बोलते, पढ़ते-लिखते हैं.
अन्य दक्षिणी प्रान्तों में भी ऐसी ही स्थिति है.
मुझे यह बताएँ लाखों हिन्दी भाषी दक्षिणी प्रांतों में नौकरी और व्यवसाय कर रहे हैं, बरसों से रह रहे हैं. उनमें से कितने किसी दक्षिणी भाषा का उपयोग करते हैं. दुःख है कि १% भी नहीं. त्रिभाषा सूत्र के अनुसार हर भारतीय को रह्स्त्र भाषा हिंदी, संपर्क भाषा अंग्रेजी तथा एक अन्य भाषा सीखनी थी. अगर हम हिंदीभाषियों ने दक्षिण की एक भाषा सीखी होती तो न केवल हमारा ज्ञान, आजीविका अवसर, लेखन क्षेत्र बढ़ता अपितु राष्ट्रीय एकता बढ़ती. भाषिक ज्ञान के नाम पर हम शून्यवत हैं. दक्षिणभाषी अपनी मातृभाषा, राष्ट्र भाषा, अंगरेजी, संस्कृत तथा पड़ोसी राज्यों की भाषा इस तरह ४-५ भाषाओँ में बात और काम कर पाते हैं. कमी हममें हैं और हम ही उन पर आरोप लगाते हैं. मुझे शर्म आती है कि मैं दक्षिण की किसी भाषा में कुछ नहीं लिख पाती, जबकि हिन्दी मेरी माँ है तो वे मौसियाँ तो हैं.
यदि अपनी समस्त शिक्षा हिन्दी माध्यम से होने के बाद भी मैं शुद्ध हिन्दी नहीं लिख-बोल पाती , अगर मैं हिन्दी के व्याकरण-पिंगल को पूरी तरह नहीं जानती  तो दोष तो मेरा ही है. मेरी अंग्रेजी में महारत भी  नहीं है. मुझे बुन्देली भी नहीं आती, पड़ोसी राज्यों की छतीसगढ़ी, भोजपुरी, अवधी, मागधी, बृज, भोजपुरी से भी मैं अनजान हूँ... मैं स्वतंत्र भारत में पैदा हुई उसके बावजूद मैं विभिन्न भाषाओ से दूर रही गलती केवल मेरी ही है.मेरी कक्षा में ऐसे विधार्थी भी है जो उर्दू, भोजपुरी, हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी का भी अच्छा ज्ञान रखते है. परन्तु मैं ही इन भाषाओ से अपरिचित हूँ मुझे इसका अफ़सोस है. देर से ही सही मुझे कम से कम इसका एहसास तो हुआ. आप भी हिंदी भाषा के साथ अन्य दक्षिणी भाषाओ को भी अपनाये ताकि प्रतिस्पर्धा कि इस दोड़ में आपको पछताना न पढ़े.
समय की चुनौती सामने है. हमने खुद को नहीं बदला तो भविष्य में हमारी भावी पीढियां हिंदी सीखने विदेश जायेंगी. आज विश्व का हर देश अपनी उच्च शिक्षा में हिन्दी की कक्षाएं, पाठ्यक्रम और शोध कार्य का बढ़ता जा रहा है और हम अपने आसपास रहने वालों को और बच्चों को हिन्दी से दूरकर अंग्रेजी में पढने के लिए  कहते  हैं. दोषी कौन? दोष किसका और कितना?,
कभी नहीं से देर भली... जब जागें तभी सवेरा... हिन्दी और उसकी सहभाषाओं पर गर्व करें... उन्हें सीखें... उनमें लिखें और अन्य भाषाओँ को सीखकर उनका श्रेष्ठ साहित्य हिन्दी में अनुवादित करें. हिन्दी किसी की प्रतिस्पर्धी नहीं है... हिन्दी का अस्तित्व संकट में नहीं है... जो अन्य भाषाएँ-बोलियाँ हिन्दी से समन्वित होंगी उनका साहित्य हिन्दी साहित्य के साथ सुरक्षित होगा अन्यथा समय के प्रवाह में विलुप्त हो जायगा.

Wednesday, January 5

सूरज

वह पढ़ने में बहुत अच्छा है. वह सोचता भी बहुत है. उसकी दो बहन है और वह सबसे बड़ा. बड़ा होने के नाते वह अपने परिवार के लिए बहुत कुछ करना चाहता है उसका नाम सूरज है. सूरज के पिता मज़दूर है, एक दिन काम करते वक़्त तीसरी मंजिल से एक कच्ची दीवार उनके ऊपर गिर गयी,दुर्भाग्यवश उनका दया हाथ टूट गया था. करीब दो महीने तक काम पर न जा पाने के कारण, सूरज के परिवार को कई मुसीबतों का सामना करना पड़ा. सूरज को वे दिन अब तक अच्छे से याद है जब माँ दुसरो के घरों के जूठे बर्तन धो कर घर चलाती थी.सूरज अपने घर की हालत देख कर कभी कुछ नही मांगता था, हालाँकि अपने दोस्तों की तरह अच्छे कपड़े पहनने का उसका बड़ा मन करता था. एक दिन वह घर के बाहर अकेला बैठा कुछ सोच रहा था, एकाएक उसकी नजर आँगन में एक छोटे से गड्ढे पर पड़ती है. गड्ढे में चींटियों का एक झुंड है. चींटियाँ लाइन से जा रही है वह चींटियों की लाइन को देखता हुआ बहुत दूर तक पहुँच जाता है जहाँ एक कीड़ा मरा पड़ा है. सभी चींटियाँ उस कीड़े का एक-एक अंश अपने मुंह में रख कर जा रही है. यह सब देख कर वह सोचता है की मैं भी इन चींटियों की तरह खूब मेहनत करूँगा और एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनूँगा... आज रात वह बिलकुल नहीं सोया,क्योंकि कल उसके स्कूल में पेपर थे.वह दंसवी में पढता है उसके सारे पेपर बहुत अच्छे गये थे ...वह बहुत खुश है और अपने पेपर की मार्कशीट लेने जा रहा है.मार्कशीट हाथ में लेते ही उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी ,वह बहुत रोया, उसे समझ नही आ रहा है कि वह क्या करे वह भागता हुआ गया और ट्रेन कि पटरी पर जा कर खड़ा हो गया. उधर से ट्रेन रफ़्तार में उसकी तरफ बढ़ रही थी....शाम को उसके घर पर एक दूसरी मार्कशीट आई,  जिसमे सूरज प्रथम आया था. मार्कशीट देखकर माँ बहुत खुश हुई . वह अभी तक सूरज की राह देख रही है पर वह घर वापस कभी नहीं आया... वह फैल वाली मार्कशीट किसी दुसरे सूरज की थी जो सूरज को मिली थी .........


''यदि हम जीवन में 'सूरज' के जाने पर रो पड़ेंगे तो आंसू भरी आँखें सितारें कैसे देख सकेंगी"

Tuesday, January 4

हमें रोटी देने वाले खुद भूखे मर रहे हैं

वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा देश को गुमराह करते हुए कहते हैं कि विश्व व्यापार संगठन के नियमो के तहत वह भारतीय किसानो को कोई नुकसान नही होने देंगे। लेकिन फिर भी किसानो की आत्महत्या की संख्या दिन प्रतिदिन क्यों बढती जा रही है इसका एक मुख्य कारण है बढता हुआ कर। भारत में किसान चिलचिलाती धूप में जानवरों की तरह काम करते हैं, फिर भी एक माह में प्रति किसान परिवार 2400  रूपये से अधिक नहीं कमा पाता। एक साल में यह राशि मात्र 28 हजार रूपये बैठती है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत के किसान गरीबी रेखा से काफी नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। अब अपनी सांस रोक लें। भारत में किसान मर रहे है, जबकि यूरोप में किसानो को 4000 रूपये प्रति हेक्टेयर प्रत्यक्ष अनुदान मिल रहा है। यह राशि भारत के किसानो की औसत आमदनी से लगभग दोगुनी है।

गैरों से कोई शिकवा नहीं

 भीड़ में भी तन्हा हूँ मैं,
गैरों से कोई शिकवा नहीं 
अपनों से कहने को कुछ बचा
फिर छोड़ न जाये कोई साथ हमारा
इसलिए अकेले बिताना है  हमको यह सफ़र हमारा
एक थी आस तुम्हारी, सोचा साथ बिताएंगे यह जिंदगानी हमारी,
पर पाने को कुछ रहा नहीं,
खोने को कुछ बचा नहीं,
हमें कोई समझ  न पाया
इस दिल में क्या है कोई जान  न पाया
भुला दिया सब कुछ एक ही पल में,
कौन है हम कह दिया एक ही लब में.
गैरों से कोई शिकवा नहीं 
अपनों से कहने को कुछ बचा नहीं
जब मन चाहा अपनाया हमें
जब मन चाहा ठुकराया हमें
हमारा मन क्या मन नही
जाओ जी लेंगे हम अकेले
फिर न कहना छोड़ दिया साथ हमारा
हम महसूस करते है तुम्हे,
इसलिए सुना दिया यह दर्द- ए-हाल हमारा
दिल से निकली ये आवाज़ है,
न कोई दोस्त,  न कोई सच्चा साथी है हमारा

Thursday, December 30

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 एक आदमी मर कर ऊपर पहुंचा,यमराज के पास हाज़िर होने से पहले उसने स्वर्ग और नरक के दरवाजे से झाँक कर वहां का नज़ारा देखा.स्वर्ग में सब कुछ अच्छा था, शान्ति थी, कोई उन्घ रहा था,कोई पढ़ रहा था,कोई प्रार्थना कर रहा था पर नरक का दृश्य अदभुत था.वहां नाच-गाना चल रहा था, खाना पीना हो रहा था.खूब रोशनी थी.जब यह आदमी यमराज के पास हाज़िर हुआ उसने  कहा  की  महाराज  मुझे  नरक  दे  दीजिये.पर जैसे ही वह नरक गया और हत्थोड़े-पिटाई  से  सामना पड़ा, तो वह  चिल्ला  पड़ा , "मेरे  साथ  धोखा  हुआ  है ". उसे  फिर  यमराज  के  पास  ले  जाया  गया , तो उसने कहा की मैंने देखा कुछ और, भोगा  कुछ और है. ये  तो धोखा ही हुआ.इस पर यमराज ने कहा की तुमने जो कुछ देखा,वह असल में नरक के विज्ञापन विभाग का कमाल था....तो देखा आपने विज्ञापन का कमाल इसलिए कुछ भी खरीदने से पहले  उसकी  पूरी  जानकारी  जरुर ले ले

जागो ग्राहक जागो

हम रो रोकर लिखते हैं वो यूं हंसकर पढ़ जाते हैं

हम रो रोकर लिखते हैं वो यूं हंसकर पढ़ जाते हैं .........
जो सपनों को तोड़ चुके हैं वो सपनों में आते है
आंसूं बरसाती आंखों ने टूटे ख्वाबों को ढोया
वादों की यादों में पड़कर जाने मन कितना रोया
हम रो रोकर लिखते हैं वो यूं हंसकर पढ़ जाते हैं .........

तुम्हारे साथ

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है
कि दिशाएँ पास आ गयी हैं,
हर रास्ता छोटा हो गया है,
दुनिया सिमटकर
एक आँगन-सी बन गयी है
जो खचाखच भरा है,
कहीं भी एकान्त नहीं
न बाहर, न भीतर।

Tuesday, November 9

सत्ता का भोग

सोनिया की सार्वजनिक छवि भले ही सरल व राजनीति की छलकपट भरी दुनिया से अपरिचित किसी महिला की हो, वे या उनके सहयोगी बड़ा नपा तुला खेल खेल रहे हैं। देखा जाये तो प्रियंका की राजनैतिक सफलता पर लोग और काँग्रेसी कार्यकर्ता अधिक आश्वस्त होते, उन्हें आगे करना ज़्यादा आसान होता। पर सोनिया प्रियंका को कीचड़ से दूर रखना चाहती हैं,  बड़े राजनेताओं के सानिध्य में रहकर सोनिया संयमित कदम उठाना सीख चुकी हैं। जब राहुल ने शुरुवात की तो वे रूखे और गैरपेशेवराना लगते थे, जो मुँह आया बोल देते थे। गये महीनों में उन्होंने कम बोलना और ज्यादा मुस्कराना सीख लिया है। राजनीति में चुप्पी का भी महत्व होता है। सोनिया ने सही मोहरे को आगे किया है और बखूबी सत्ता के केंद्र से दूर रहकर रिमोट सत्ता का सुख भोग रही हैं। राजनीति के मैखाने में रहकर मदिरा का स्वाद लेने की मजबूरी हो जाती है।

काँग्रेसी राजनीति की इस उथलपुथल में दल के नेताओं में बैचेनी काबिज है। राजनैतिक वनवास भोग रहे नटवर सिंह ने शगूफा छोड़ा कि अब उम्रदराज़ नेताओं को पद छोड़ कर नये लोगों को मौका देना चाहिये। बहुत अनुनय की थी आलाकमान से कि, “मैडमजी मोरे अवगुन चित्त न धरो”, पर पद जाता रहा।  कुर्सी जाने के बाद, उम्र के इस पड़ाव में ऐसे ख्याल अक्सर आने लगते हैं। व्हील चेयर से जकड़े अजीत जोगी जैसे नेताओं की राजनैतिक महत्वाकांक्षा पर भी कुठाराघात हुआ, “राहुल जैसे गैर अनुभवी को आगे करने का क्या मतलब?” तुरंत गुहार लगा कर कहा की सोनिया बने प्रधानमंत्री। अंदाज़ था कि गाड़ी के पहिये में लाठी अड़ाकर राजनैतिक अविश्वास की ज्वाला भड़का देंगे पर आलाकमान की फटकार से दुबक कर बैठ गये।

युवाओं को सामने लाने की हर ऐसी बात पर हर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती है। जब तक खाट न पकड़ लें भाजपा में भी आडवाणी के समानान्तर या उपर कोई नहीं। राजनाथ सिंह मनमोहन सिंह जैसे प्रॉक्सी पद से संतोष कर रहे हैं। समय रहते कुछ  पाने की आकांक्षा अति प्रबल हो तो फिर उमा भारती जैसे नई पार्टी बनानी पड़ती है या फिर “बहन” मायावती जैसे अपने बड़े नेता को बीमार बता कर उन्हें हाउस अरेस्ट में रख पद हथियाने का कुकर्म करना पड़ता है।


पके फल करुणानिधि पुनः सत्ता का भोग लगाने बैठे हैं, मधुमेह के रोगी की मीठा खाने की इच्छा जैसा है यह सत्ता सुख भोगने का शौक। शौक जो करूणानिधि जैसे धुरंधर नेताओं और सोनिया जैसी अनुभवहीन, किसी को भी अफीम की लत की तरह लग सकता है।


DEEPIKA

Sunday, November 7

कोई कहे कहता रहे!!!!

नेता बनने के लिये जिस्मानी और रूहानी खाल दोनों का मोटी होना ज़रूरी है। जीवन का आदर्श वाक्य होना चाहिये “कोई कहे कहता रहे कितना भी हम को…”। बेटे के साथ अन्याय के नाम पर कब्र मे पैर लटकाये करूणानिधि ने नई पार्टी तैरा दी, राज्यपाल बूटा सिंह के राज्य की नौका के पाल खुलम्म खुल्ला उनके बेटे संभाल रहे हैं, काबिना मंत्री और मातृभक्त मणिशंकर अय्यर एक तेल कूँए का उद्घाटन करने पहुँचे तो उसका नामकरण अपनी अम्मा के नाम पर कर दिया, गोया यह देश की नहीं व्यक्तिगत संपत्ति हो।

दागी मंत्रियों को निकालने के लिये संघटन और विपक्ष दोनों लामबंद हैं पर वे बेफिक्री से सत्तासुख भोगते हुए अपनी सात पुश्तों की पेंशन फंड तैयार कर रहे हैं। वर्तमान काँग्रेसी सरकार ने तो सरकारी तंत्र में एक और सतह का परोक्ष निर्माण कर दिया है। पहले राष्ट्रपति को लोग रबर स्टैम्प का पद कहते थे अब ऐसा पद प्रधानमंत्री के लिये भी बन गया। पराये खड़ाउं रख कर राज चला रहे हैं मनमोहन। लोग हाय तौबा करते रहें सत्ता के दो केद्रों पर, अपन तो कानों में रुई डाल कर रूस की राजकीय यात्रा करेंगे।


अब सामंती और जमींदारी राज के दिन तो कथित रूप से ख़त्म हो गये थे पर लोगों के तेवर कहाँ जाते हैं। वैसे मैं नवाब पटौदी की बात नहीं कर रहा। ये बात उसी परिवार की है जिस के नाम के बिना काँग्रेस की पहचान नहीं बन पाती। पता नहीं आप ने यह ध्यान दिया कि नहीं कि किस चतुराई से सोनिया गाँधी ने प्रधानमंत्री का पद ठुकरा कर कई निशानों पर तीर चलाये।

 राजनीतिक अनुभवहीनता से जो बट्टे उन पर लगते उन से से बचने का यह जोरदार तरीका था ही, राजीव के अनुभव से वह कम से कम यह तो सीख ही चुकी होंगी कि ऐसे में सरकार तो किचन कैबिनेटें ही चलातीं हैं और अनजाने ही बोफोर्स जैसी पाप की गठरिया कोई बगल में सरका दे तो इज्जत भी खराब होती है। परोक्ष रूप से सरकार चलाने से पब्लिक की नज़र से बचकर अपना उल्लू सीधा करना ज्यादा आसान है।


एक और निशाना जो साधा गया वह है राहुल का औपचारिक रूप से राजकुमार के रूप में पदस्थापन। राजकुमार का राज्याभिषेक करने के पूर्व ईमेज बिल्डिंग करना तो ज़रूरी है ही सो सरकारी भोंपू काम में लाये जा रहे हैं। जनता पहचान ले अपने राजकंवर को, निहाल हो जाये, फिदा हो जाये, और जब ट्रकों से उतरें तो  आँखें मूँद कर शहीद पिता और बलिदानी माता के सलोने पुत्र को बिना पाँच का नोट लिये वोट डालने को तैयार हो जाये।
rahul_gandhi.jpgएक दिन समाचार देख रहा था दूरदर्शन पर। समाचार वाचक ने अमेठी की खबर दी, राजकुमार ने सगरे गाँव बिजली देने का वादा पूरा किया था, गाँव वालों को याद भी न होगा कि ये वादे कितनी बार किये गये।

 सरकारी उद्यम भेल के लोग भी मंच पर थे। प्रसारण “सीधा” हो रहा था, मानो संयुक्त राष्ट्र में पी.एम भाषण दे रहे हों। कैमरे के दायरे में फंसे सज्जन पात्र परिचय के बाद राजकुमार के गुण गाने लगे। प्रसारण सीधा चलता रहा। काफी देर बाद शायद निर्माता की तंद्रा भंग हुई और वे वापस लौटे सामंती सम्मोहन से। हैरत तब हुई जब दूरदर्शन ने दूसरे दिन के समाचारों में पुनः इसी समारोह की टीवी रपट दिखलाई। पी.एम.ओ ने डपट लगाई होगी, “टाईम का हिसाब नहीं रखते, समाचार को दस मिनट डीले नहीं कर सकते थे। राजकुमार का क्लोज़अप तक नहीं। अगर मैडम ने देख लिया होता तो मैं जाता इम्फाल और तुम जाते श्रीनगर दूरदर्शन केंद्र!” वैसे राहुल मुँहफट हैं, राजनयिक बोली अभी सीखी नहीं हैं सो चचा संजय नुमा निपट सोचते बोलते हैं, जतला दिया कि बुलाया था सो आये बाकी कुछ खबर नहीं।
तो हम लोग ये देखते रहेंगे, सोचते रहेंगे, लिखते रहेंगे।

इस बीच ईमेज बिल्डिंग की कवायद पूरी हो जायेगी, भाड़े की संस्थायें बाजार सर्वेक्षण कर हवा का रूख बतलायेंगी और उचित समय देखकर हो जायेगा राज्याभिषेक। मनमोहन जी खड़ाउं राज करने के लिये शुक्रिया! आप जायें। एकाध संस्मरण छपवा लें, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, फिर जो आप कहें, हैंहैंहैंहैंहैं। हमारे बच्चे स्कूली निबंध में लिखेंगे कि जमींदार होते थे कभी। पत्रकार भवें उमेठकर परिवारवाद की भर्त्सना करेंगे फिर सरकार की पहली वर्षगाँठ पर 6 चिकने पेज का परिशिष्ट छापेंगे। उधर इतालवी स्पा में बबल बाथ लेते राजकुमार की त्वचा भाप से कठोर होने के गुर लेती रहेगी। कोई कहे कहता रहे…


DEEPIKA...

Friday, November 5

धाक में ब्लॉगवाणी चिट्ठाजगत से आगे ;)

चिट्ठाजगत तकनीकी रूप से समृद्ध एग्रीगेटर है, ब्लॉगवाणी से फीचर्स के मामले में अव्वल। दीगर बात है कि पैकेजिंग और रूप के मामले में चिट्ठाजगत पिछड़ जाता है। पर एक चीज़ जिसमें ब्लॉगवाणी चिट्ठाजगत से आगे है और वो है धाक का मामला, जी नहीं मैं फाँट वगैरह बनाने की धाक की नहीं ;)  बल्कि चिट्ठाजगत पर “धाक” संख्या और ब्लॉगवाणी पर “पसंद” संख्या की बात कर रहा हूं।
 चिट्ठाजगत की धाक स्वचालित रूप से आती है, मुझे नहीं पता कहाँ से आती है। पर ब्लॉगवाणी का खास फ़ीचर है “डिग” शैली का पसंदोमीटर।
कुछ समय पहले घुघुती जी ने लिखा था कि अपना लिखा पसंद है ये समझाने के लिये पसंदोमीटर में 1 थपकी तो दिखनी ही चाहिये। तो इस खुराफात :idea:  को अंजाम देने के लिये आपको फायरफाक्स की ज़रूरत होगी। अब अपनी पोस्ट पर जाकर पसंदोमीटर को थपकायें, दूसरी थपकी देने पर वो आपको धमकायेगा कि “आपका मत दर्ज किया जा चुका है” वगैरह, पर आप हार न मानें।
ब्राउज़र को रिफ्रेश करें और थपकी दुबारा लगायें। लग गया न? नहीं लगा तो एक बार और रिफ्रेश करें या ब्राउज़र बंद कर पुनः खोलें। बस अब जितना मन चाहें इस प्रक्रिया को दुहरायें। आज अपन ने ये बीड़ा उठाया और चुना एक ऐसी पोस्ट को जिसका शीर्षक मेरे मन की बात करता है, “कविता हमारे समय का सबसे बड़ा फ्रॉड है”। इसको देखिये कैसे ज़ीरो से हीरो बना दिया। :mrgreen:
Blogvani Pasandometer

ध्यान दें कि इसमें कुकी वगैरह हटाने का दुष्कर्म नहीं किया गया। पर पसंदोमीटर पर सरसरी नज़र डालने पर अपन राम का मन कहता है कि ये राज़ कई और खुराफातियों को भी मालूम था :lol:
पुनःश्च: अगर दिल पे लगी हो तो टिप्पणी करने का कष्ट न करें....
DEEPIKA

Saturday, October 30

किशोर ने तोड़ा आईफोन का तिलिस्म

आईफोन अमरीका में सबकी ज़बान पर है, जिनके पास ये है उनके पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ रहे और जिनके पास नहीं है वो इसकी कीमत गैरवाजिब बता कर कन्नी काट रहे हैं। खैर निरंतर पर एक लेख में ईस्वामी ने काफी पहले लिखा था कि इस फोन की सबसे बड़ी खामी है कि ये केवल एक ही सर्विस प्रोवाईडर के साथ काम करता है और वो है एटीएंडटी। George Hotzऔर इसी बात का तोड़ निकालने के लिये अपनी गर्मियों की छुट्टी शहीद की 17 साल के किशोर जॉर्ज होट्ज़ ने जिन्होंने 500 घंटों की मेहनत के बाद हार्डवेयर में सेंघ लगाकर अपना टीमोबाईल का सिम आईफोन पर चला ही लिया।
 जॉर्ज ने ये सारी कारगुज़ारी करते समय अपने ब्लॉग पर लगातार अपडेट ही नहीं दिये, इसे दोहराने के तरीके भी बताये, हालांकि कौन अपने 500 डॉलर के फोन पर ये जोखिम उठाता ये शोचनीय प्रश्न है। वो ये दावा करता है कि ये गैरकानूनी काम नहीं था, और खुशनसीबी से एप्पल और एटीएंडटी दोनों ने ही उससे कोई पूछताछ नहीं की है।
उल्लेखनीय बात ये है कि जॉर्ज ने ये सारी जानकारी गुप्त रखने या बेचने की बजाय उसको जाल पर सार्वजनिक रखा और उसकी नेकनीयति का फल ये मिला कि उसके अनलॉक्ड फोन के बदले एक कंपनी सर्टीसेल ने उसे उसकी ही इच्छा के मुताबिक एक चमचमाती निसान 3507 भेंट कर दी। साथ ही दिये तीन 8 जीबी के नये आईफोन और नौकरी भी। ये भी खबर है कि गूगल ने भी उसे नौकरी का न्योता दिया है। मेहनत और अच्छी नीयत का फल वाकई मीठा होता है।
देखिये जॉर्ज से ये साक्षात्कार, इसमें उसका उत्साह और आत्मविश्वास दंग कर देता है। अच्छा लगता है जब वो इंटरनेट समुदाय के मदद की बात करता है।
DEEPIKA