Tuesday, January 4

गैरों से कोई शिकवा नहीं

 भीड़ में भी तन्हा हूँ मैं,
गैरों से कोई शिकवा नहीं 
अपनों से कहने को कुछ बचा
फिर छोड़ जाये कोई साथ हमारा
इसलिए अकेले बिताना है  हमको यह सफ़र हमारा
एक थी आस तुम्हारी, सोचा साथ बिताएंगे यह जिंदगानी हमारी,
पर पाने को कुछ रहा नहीं,
खोने को कुछ बचा नहीं,
हमें कोई समझ  न पाया
इस दिल में क्या है कोई जान  न पाया
भुला दिया सब कुछ एक ही पल में,
कौन है हम कह दिया एक ही लब में.
गैरों से कोई शिकवा नहीं 
अपनों से कहने को कुछ बचा नहीं
जब मन चाहा अपनाया हमें
जब मन चाहा ठुकराया हमें
हमारा मन क्या मन नही
जाओ जी लेंगे हम अकेले
फिर न कहना छोड़ दिया साथ हमारा
हम महसूस करते है तुम्हे,
इसलिए सुना दिया यह दर्द- ए-हाल हमारा
दिल से निकली ये आवाज़ है,
न कोई दोस्त,  न कोई सच्चा साथी है हमारा

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