Saturday, January 22

बदलते विज्ञापन....




वे दौर अब नहीं रहा जब टीवी पर विज्ञापन आते ही आपकी नजर रिमोट पर दौड़ती थी और आप फट से चैनल बदल देते थे। मौजूदा दौर में एकता कपूर के के सीरियल भले ही उबाउ हो चले हों पर विज्ञापन समय दर समय रोचक होते जा रहें हैं। अब किसी खास विज्ञापन की वजह से आप चैनल बदलते बदलते उंगलियों को रोक दें ऐसा सम्भव है। विज्ञापन अब एक बड़ा उद्योग बन चला है और इस उद्योग में रचनात्मकता की उड़ान अपने उफान पर है। विज्ञापन विभिन्न संस्थानों में एक विषय के रुप में पढ़ाया जाने लगा है और इस क्षेत्र में ऐसे ऐसे दिग्गज निकलकर आ रहे हैं जिन्होंने नीरस ढ़र्रे पर चले आ रहे विज्ञापन उद्योग को नई शक्ल  दे दी है।

सितारों की चमक
विज्ञापन में फ़िल्मी सितारों  के शामिल  होने से उत्पाद की बिक्री  में कोई फर्क पड़ता है या नहीं यह हमेशा चर्चा का विषय रहा है। लेकिन उत्पादनकर्ता कम्पनियों में स्टारकास्ट की छवि को भुनाने की होड़ हमेशा ही रही है यही कारण है कि कभी आमिर खान साब जी बनकर ठंडे का मतलब दर्शकों को  बताते हैं तो कभी सलमान खान शूटिंग शर्टिंग के विज्ञापन के जरिये क्या हिट क्या फिट समझाते हैं। कभी अमिताभ बच्चन दो बूंद जिन्दगी के मायने चुटकी बजाते ही समझा देते हैं तो कभी सनी  देओल अपने दो किलो के हाथ का हवाला देते हुए अन्डरगारमेंट को हिट करने की कोशिश  करते  दिखाई देते हैं। यही नहीं ओम पुरी, जावेद अख्तर, इरफान खान और कैलाश  खैर जैसी फिल्मों से जुड़ी हुई हस्तियों की दमदार आवाज भी इन दिनों विज्ञापनों का जायका बढ़ा रही है। हांलाकि उत्पादनकर्ता कम्पनियां यह समझाती हैं कि बात जब उत्पाद की विश्वसनीयता पर आती है तो लोग सितारों के भरोसे ही खरीददारी नहीं कर लेते लेकिन पूरी रणनीति के साथ चलने वाली ये कम्पनियां अगर अपने उत्पाद के प्रोमोशन  के लिए फिल्मी सितारों पर इतना पैसा बहा रही हैं तो जाहिर  है इसकी कोई ठोस वजह जरुर होगी।

कमाल पंच लाइन का
विज्ञापनों में पंचलाइन की भूमिका शुरु से ही अहम रही है। साड़ी पहने हुए एक आदर्श भारतीय नारी जब गृहणियों को फेना ही लेना की सलाह देती थी तो उसका एक अलग ही असर होता था। यह असर कुछ वैसा ही था जैसे हमारे बीच का ही कोई खुशमिजाज हितेषी  हमें नेक सलाह दे रहा हो। धीरे धीरे पंचलाइन समय के साथ टेंडी होने लगी। ठंडे का मतलब कोकाकोला बताया जाने लगा। इच्छा भले हो या ना हो पर दिमाग में दिल मांगे मोर छाने लगा। इतने से ही काम ना चला तो कोल्डड्रिंक  को मर्दानगी और सेन्सेशन  से जोड़कर टेस्ट द थन्डर का रुप दे दिया गया। लेकिन पंचलाइन को अभी और फक्कड़ होना था। आपकी और हमारी रोजमर्रा की भाषा  के और करीब आना था। ऐसे में दिमाग की बत्ती जला देने का सिलसिला शुरू  हुआ। विज्ञापनों में कभी जोर का झटका धीरे से लगने लगा तो कभी यारा दा टशन, तो कभी दो रूपए के दो लड्डू   भाषा  का हिस्सा बन गया। चन्द शब्दों की इस बाजीगरी से दर्शक  एक बार सोचने को मजबूर जरुर हुए कि क्या इसी तरह का कोई आइडिया उनकी जिन्दगी को बदल सकता है।

Thursday, January 20

'सलमान' ने करवाया 'अमिताभ'को आईफा से बेदखल!

salman-khan-amitabh-bachchanकल तक खबर ये थी कि बॉलीवुड के शंहशाह अमिताभ बच्चन प्रमुख अवार्ड समारोह आईफा से अलग हो गए हैं। चारों ओर ये खबर थी आखिर ये कैसे हो गया? पिछले दस सालों से आईफा और अमिताभ दो जिस्म और एक आत्मा रहे हैं, फिर दोनों के बीच में दरार कहां से आ गई जिसकी वजह से अमिताभ को आईफा से अलग होना पड़ा।
फिल्मी गलियारों में अफवाओं का बाजारा गर्म है, लेकिन फिल्मी पंडितों ने इसके पीछे बॉलीवुड के दंबग सलमान खान को कारण बताया है। खबर ये आ रही है कि पिछली बार अमिताभ इस अवार्ड फंक्शन के ब्रांड एंबेसडर होने के बावजूद भी श्रीलंका नहीं गये थे, वो भी बिना कोई वाजिब कारण बताये। ये बात अलग है कि उस समय उनके सुपुत्र और बहुरानी की फिल्म रावण को प्रदर्शित होना था जिसके चलते वो वहां नहीं गए थे।

लेकिन अमिताभ ने आईफा को कोई सूचना नहीं दी, आईफा ने उनकी जगह सलमान को मौका दे दिया, सलमान ने स्टेज और मंच दोनों को ही बखूबी संभाल लिया, और तो और बॉलीवुड के इस प्लेबॉय ने सबका दिल भी जीत लिया। कहा ये भी जा रहा है सलमान से होस्टिंग कराये जाने की वजह से अमिताभ काफी क्रोधित थे।

सूत्रों की मानें तो बिग बी आईफा के इस फैसले से बेहद दुखी थे कि उनकी सलाह लिए बिना ही आयोजकों ने न सिर्फ श्रीलंका में समारोह आयोजित कराने का फैसला किया बल्कि सलमान खान को बतौर होस्ट भी साइन कर लिया। आईफा के इस फैसले के बाद ही अमिताभ ने नाता तोड़ने का मन बना लिया। इन बातों से तो यही लग रहा है कि बॉलीवुड के दंबग से डर गया शहंशाह।

'फिदा' के जाने पर ये स्यापा क्यों?



मकबूल कतर जा रहे हैं। अब वहीं बसेंगे और वहीं से अपनी कूचियां चलाएंगे.. ये खबर सुनकर हिंदुस्तान में कुछ लोगों को बड़ा अफसोस हो रहा है। इस गम में वो आधे हुए जा रहे हैं कि कुछ अराजक तत्त्वों के चलते एक अच्छे कलाकार को हिंदुस्तान छोड़कर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस पूरे ड्रामे को देखकर उन तथाकथित सहिष्णु लोगों पर हंसी, हैरानी और गुस्सा आता है।
95 साल का एक बूढ़ा जो अब तक आम लोगों की भावनाओं को अपनी कला के जरिये ठेंगे पर दिखाने की कोशिश करता आया है, जब वो खुद अपनी मर्जी से, अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए हिंदुस्तान छोड़ कर जा रहा है तो फिर ऐसे लोगों का कलेजा भला क्यों फट रहा है..? क्यों.. क्योंकि उनके पास आधी-अधूरी जानकारी है। ऐसे लोगों को चाहिए कि वो इस पूरे ड्रामे को अपनी सहिष्णुता का झूठा चश्मा उतारकर ईमानदारी से देखें।

मकबूल कतर में बस रहे हैं क्योंकि वहां उन्हें शाही परिवार का चारण बनकर शाही परिवार के लिए पेंटिंग बनाने का काम मिल गया है और जाहिर तौर पर जिंदगी को विलासिता से जीने के लिए वो शाही परिवार इस कलाकार को बेशुमार पैसा दे रहा है। पैसा इस करोड़पति कलाकार की पुरानी कमजोरी रही है। ये तस्वीरें सिर्फ अमीरों के ड्राइंग रूम के लिए बनाते हैं। इनकी करोड़ों की पेंटिंग्स खरीदने वाले धनपशुओं के लिए समाज का मतलब उनकी पेज थ्री सोसायटी होती है और खाली वक्त में टीवी चैनलों पर बैठकर किसी को भी धर्मनिरपेक्ष और धर्मांध होने का सर्टिफिकेट बांटना उनका शौक होता है। सवाल ये है कि हुसैन ने कुछेक 'पेंटिंग' बनाने के अलावा इस देश के लिए क्या कुछ सार्थक किया है? क्या उन्होंने गरीब.. अनाथ बच्चों के लिए कोई एनजीओ खोला या क्या उन्होंने पेंटिंग के जरिये कमाई अपनी करोड़ों-अरबों की दौलत का एक छोटा सा हिस्सा भी इस देश के सैनिकों के लिए समर्पित किया? मकबूल ने जो कुछ भी किया सिर्फ अपने लिए किया।
तर्क देने वाले तर्क देते हैं कि एक कलाकार को कला की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। जरूर मिलनी चाहिए लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि वो अपनी इस स्वतंत्रता का इस्तेमाल बार-बार दूसरों की सहनशक्ति का परीक्षण करने के लिए करें? कहते हैं अश्लील पेंटिंग्स का विरोध हुआ तो मकबूल व्यथित हो गए। सरकार ने सुरक्षा का भरोसा दिलाया, लेकिन मकबूल को भरोसा नहीं हुआ। दरअसल मकबूल को समझ में आ गया था कि सरकार पर भरोसा न करने से पब्लिसिटी कुछ ज्यादा ही मिल रही है। लोगों के बीच इमेज एक ऐसे 'निरीह प्रतिभावान' कलाकार की बन रही है, जो अतिवादियों का सताया हुआ है। ये तो वाकई कमाल है। दूसरों की भावनाएं आपके लिए कुत्सित कमाई का सामान हैं। उस पर अगर विरोध हो तो आप बौद्धिक बनकर उनके विरोध पर भी ऐतराज जताने लगें।
अगर आपका दिल इतना ही बड़ा था तो आप एक माफी का छोटा सा बयान जारी कर खुद के एक दरियादिल कलाकार होने का परिचय दे सकते थे? मामले को शांत कर सकते थे। लेकिन आपके लिए न तो हिंदुस्तान के भावुक लोग कोई अहमियत रखते हैं और न ही हिंदुस्तान की न्याय व्यवस्था का आपके लिए कोई मतलब है। अश्लील पेंटिंग का मामला कोर्ट में गया तो इस 'कलाकार' ने एक बार भी कोर्ट में हाजिर होना जरूरी नहीं समझा। कोर्ट ने इसे अवमानना के तौर पर लिया और फिर मकबूल के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया, फिर भी मकबूल को अक्ल नहीं आई। आती भी कैसे? अक्ल न आने की कीमत पर ही तो इतनी सारी पब्लिसिटी और करोड़पतियों के ड्राइंग रूम में पेंटिंग रखे जाने का कीमती तोहफा मिल रहा था। कतर में बसने की खबर भी मकबूल ने ऐसे फैलाई है, जैसे वो इसके जरिये हिंदुस्तान के मुंह पर तमाचा रसीद करने की खवाहिश पूरी कर रहे हों।
दुबई में डेरा डाले हुसैन ने एक अंग्रेजी दैनिक को खुद अपनी तस्वीरें भेजी और कतर की नागरिकता मिलने की खबर दी। एक अखबार को खबर देने का मतलब ये था कि ये खबर पूरे देश में फैले। सरकार के तमाम आश्वासनों के बावजूद मकबूल के दिल में इस मुल्क में बसने की कोई ख्वाहिश नहीं है। अगर ये ख्वाहिश होती तो फिर इस देश में लौट आने के कई बहाने मकबूल के पास होने चाहिए थे। अगर बात विरोध की ही थी तो जितना विरोध 'माई नेम इज खान' का हुआ, उतना मकबूल का तो कतई नहीं हुआ था। 'खान' बढ़िया तरीके से रिलीज भी हुई और शाहरूख आज भी अपने मन्नत में उसी शान के साथ रह रहे हैं, जैसे पहले रहते थे।
दरअसल मकबूल में खुद को सताया हुआ कलाकार दिखाने का शौक कुछ ज्यादा ही था। इसके साथ ही मकबूल का 'कला' बाजार दुबई और कतर जैसे अरब मुल्कों में खूब बढ़िया चलने भी लगा था। तेल भंडारों से बेशुमार पैसा निकाल रहे शेखों के पास अपने हरम पर खर्च करने के अलावा मकबूल की पेंटिंग खरीदने के लिए भी खूब पैसा है। मकबूल को और चाहिए भी क्या? सवाल ये है कि कतर में मकबूल को अपना बाजार दिख रहा है या फिर मकबूल को वाकई कतर में किसी कमाल की धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता की आस है? अगर ऐसा है तो फिर मां सरस्वती की तरह ही कतर में मकबूल बस एक बार अपने 'परवरदिगार' की एक 'पेंटिंग' बना दें.. फिर देखते हैं, जिस कतर ने आशियाना दिया है वो कतर मकबूल को एक नया आशियाना ढूंढने का वक्त भी देता है या नहीं।
DEEPIKA
 

अलग –अलग विधा हैं साहित्य और सिनेमा

साहित्य और सिनेमा के रिश्ते की जब भी चर्चा होती है, हिंदी में एक तरह की वैचारिक गर्मी आ जाती है। किसी साहित्यिक कृति पर बनी फिल्म को लेकर अक्सर साहित्यकारों को शिकायत रहती है कि फिल्मकार या निर्देशक ने उसकी रचना की आत्मा को मार डाला। हिमांशु जोशी ने अपनी कहानी सुराज पर बनी फिल्म में मनमाने बदलाव के बाद भविष्‍य में अपनी कहानी पर फिल्म बनाने की अनुमति देने से कान ही पकड़ लिये। हालांकि राजेंद्र यादव, जिनके मशहूर उपन्यास सारा आकाश पर इसी नाम से फिल्म बन चुकी है, मानते रहे हैं कि कहानी और उपन्यास जहां लेखक की रचना होती है, वहीं फिल्म पूरी तरह निर्देशक की कृति होती है। कुछ ऐसा ही विचार हरियाणा अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टीवल के तीसरे दिन सिनेमा और साहित्य के रिश्ते पर आयोजित गोष्ठी में शामिल वक्ताओं के भी रहे।
मशहूर फिल्मकार के. बिक्रम सिंह का कहना है कि साहित्य और सिनेमा के रिश्ते पर चर्चा के वक्त हिंदी में विवाद की असल वजह है कि दरअसल हिंदी में विजुअल आधारित सोच का विकास नहीं हुआ है, बल्कि सोच में शाब्दिकता का जोर ज्यादा है। उनका कहना है कि सिनेमा में कला, संगीत, सिनेमॉटोग्राफी, कला निर्देशन जैसी कई विधाओं का संगम होता है। ऐसे में साहित्य को पूरी तरह से सेल्युलायड पर उतारना संभव नहीं होता। उन्होंने सत्यजीत रे की फिल्म पाथेर पांचाली का उदाहरण देते हुए कहा कि इस उपन्यास में जहां करीब पांच सौ चरित्र हैं, वहीं फिल्म में महज दस-बारह। उन्होंने श्रीलंका के मशहूर उपन्यासकार लेक्सटर जेंस पेरी का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके उपन्यास टेकावा पर जब फिल्म बनी और उनसे प्रतिक्रिया पूछी गई तो पैरी ने कहा था कि उपन्यास उनका है, जबकि फिल्म निर्देशक की है। उन्होंने रवींद्र नाथ टैगोर के हवाले से कहा कि सिनेमा कला के तौर पर तभी स्थापित हो सकेगा, जब वह साहित्य से छुटकारा पा लेगा। हालांकि मशहूर फिल्म समीक्षक और कवि विनोद भारद्वाज ने रवींद्र नाथ टैगोर की कहानी चारूलता का उदाहरण देते हुए कहा कि अच्छे साहित्य पर अच्छी फिल्में बनाई जा सकती हैं। जिस पर सत्यजीत रे ने बेहतरीन फिल्म बनाई है। भारद्वाज ने शरत चंद्र के उपन्यास देवदास पर बनी विमल राय की फिल्म देवदास और अनुराग कश्यप की देव डी का उदाहरण देते हुए कहा कि एक ही कृति पर अलग-अलग ढंग से सोचते हुए अच्छी फिल्में जरूर बनाई जा सकती हैं। उनका सुझाव है कि साहित्यकारों को यह सोचना चाहिए कि महान साहित्यिक कृतियों के फिल्मांकन के वक्त छेड़छाड़ उस कृति की महानता से छेड़छाड़ नहीं है। साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्मों की रिलीज के बाद साहित्य और सिनेमा के रिश्तों में आने वाली तल्खी का ध्यान फ्रेंच फिल्मकार गोदार को भी था। यही वजह है कि वे अच्छी और महान कृति पर फिल्म बनाने का विरोध करते थे। वैसे सिनेमा और साहित्य के रिश्ते को समझने के लिए फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे के पूर्व निदेशक त्रिपुरारिशरण नया नजरिया देते हैं। उनका कहना है कि चूंकि साहित्य का जोर कहने और सिनेमा का जोर देखने पर होता है, लिहाजा भारत में दोनों विधाओं के रिश्तों में खींचतान दिखती रही है। उनका मानना है कि चूंकि यूरोप में कहने और देखने का अनुशासन विकसित हो चुका है, लिहाजा वहां साहित्य और सिनेमा के रिश्ते को लेकर वैसे सवाल नहीं उठते, जैसे भारत में उठते हैं। शरण के मुताबिक यही वजह है कि भारत में प्रबुद्ध सिनेकार महत्वपूर्ण रचनाओं को छूना तक नहीं चाहते। उनका सुझाव है कि सिनेमा और साहित्य असल में दो तरह की दो अलग विधाएं हैं, लिहाजा उनके बीच तुलना होनी ही नहीं चाहिए।

फ़िल्मी पर्दे से ओझल होता भारतीय किसान

खेती-किसानी भारतीय समाज की जीविका का मुख्य आधार है, इसलिए समय-समय पर हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी कई ऐसी फ़िल्में बनती रहीं जो किसानों की जीवन-शैली और उनकी मुश्किलों पर प्रकाश डालती हैं, लेकिन आज समाज का आइना कहा जानेवाला हमारा सिनेमा हमारे किसानों को भूल गया है। सालाना हज़ारों फ़िल्मों का निर्माण स्थल मुंबई बॉलीवुड में आज किसानों की सुध लेनेवाली फ़िल्में नदारद हैं।
हाल ही में किसानों पर आधारित दो फ़िल्में रिलीज हुईं `गोष्ट छोटी डोंगराएवढ़ी' और `किसान'। दिवंगत अभिनेता नीलू फुले की आखिरी फ़िल्म मानी जानेवाली मराठी फ़िल्म `गोष्ट छोटी डोंगरावढ़ी' को लोगों का अच्छा प्रतिसाद मिला, लेकिन उसकी वजह फ़िल्म का विषय और नीलू के अलावा इस फ़िल्म का `मराठी' भाषा में होना रहा। लेकिन विदर्भ के किसानों की आत्महत्या का यह मार्मिक चित्रण सिऱ्फ मराठीभाषी क्षेत्रों से ही दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित कर सका। वहीं सोहेल खान निर्देशित `किसान' नरम पटाखे की तरह बॉक्स ऑफिस पर धमाका करने में असफल रही। इसकी एक बड़ी वजह इस फ़िल्म की कमजोर पटकथा को माना जा रहा है। प्रयोगात्मक सिनेमा के लिए मशहूर मधुर भंडारकर के मुताबिक ऐसी फ़िल्मों के सफलता के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि उनकी कहानी को दर्शकों की पसंद के अनुसार ढालकर प्रस्तुत किया जाये। पर्दे पर सिऱ्फ गांव के दृश्य दिखाकर किसी कमजोर और देखी-दिखायी कहानीवाली फ़िल्म को भला कैसे बेचा जा सकता है।हिंदी फ़िल्मों में किसानों की बात उठे तो दिमाग में एक ही नाम आता है- मनोज कुमार। हममें से अधिकांश बचपन से मनोज कुमार की फ़िल्मों में गांव को देखकर बड़े हुए और उनकी वो फ़िल्में आज भी देखी जाती हैं, नि:संदेह इसकी वजह मनोज कुमार की दूरदर्शिता और सामायिक मुद्दों की पहचान में उनका सक्षम दिमाग ही माना जा सकता है। आजादी के बाद गांवों के विकास के ज़रिये देश का विकास करने की योजनाएं बन रही थीं। मनोज कुमार ने उसी दौर में गांवों की बदलती परिस्थितियों, किसानों की जरूरतों और भारतीय परिवारों में आपसी मेलजोल बनाये रखने में आ रही मुश्किलों को कथावस्तु बना अपनी फिल्मों में गांवों के तत्कालीन चेहरे को लोगों के सामने प्रस्तुत किया। उससे पहले किसानों पर आधारित `दो बीघा जमीन' और `मदर इंडिया' जैसी सफल फ़िल्में भी बन चुकी थीं। अच्छी कहानी के साथ उनकी भी लोकप्रियता की वजह उनका सामायिक होना ही था।
परिवर्तन समय का नियम है और उसी समय ने भारतीय सिनेमा जगत की परंपराओं को भी बदल दिया। १९७० के दशक में `शोले' जैसी फ़िल्मों में गांवों का चित्रण तो हुआ, लेकिन खेती-किसानी पर्दे पर नहीं दिखी। इस फ़िल्म के बाद गांवों की पृष्ठभूमि में ऐसी कई फ़िल्में बनीं, लेकिन पारिवारिक ड्रामे, डकैती, मार-धाड़ और नाच-गाने के अलावा इन फ़िल्मों में और कुछ नहीं दिखा। `दुश्मन', `मेला' `गौतम गोविंदा', `धरती कहे पुकार के' जैसी फ़िल्मों का कमर्शियल मसालों से भरपूर होने के बावजूद इनमें कभी-कभार भारतीय किसान और उसकी जिंदगी के दर्शन होते रहे, लेकिन उसके बाद हिंदी फ़िल्मों से किसान गायब होते रहे और धीरे-धीरे बॉलीवुड उन्हें भूलता सा गया। आज भारत की पहचान आइटी हब के रूप में बन रही है, लेकिन दुनियाभर की चीजों को बेचने का महत्वपूर्ण बाजार बन चुके भारत का एक रूप उसके गांवों में बसता है, जहां किसी आलीशान टॉवर, हॉट डॉग, ब्लैकबेरी या ब्रांडेड कपड़ों की मांग नहीं है। उन गांवों का निवासी वहां का किसान अपने खेतों में अनाज उगाने के लिए पहले उन खेतों को गिरवी रखता है और फिर कर्ज न चुका सकने की स्थिति में अपनी जीवनलीला अपने ही हाथों खत्म कर देता है, लेकिन शहरी चकाचौंध को कैमरे में कैद करनेवालों की तरफ यह मजबूर किसान मदद की आस भरी नज़रों से नहीं देख सकता क्योंकि उन्हें उसका दर्द दिखायी नहीं पड़ता। उन्हें टैक्टर, ट्यूबवेल, आमों का पेड़ या तालाब के किनारे पानी पीते गाय-बछड़ों या कच्चे मकानों की खूबसूरती आकर्षित नहीं करती।
यह सच है कि हिंदी फ़िल्मों का दर्शक परदे पर अपना गांव और खेल-खलिहान देखना चाहता है लेकिन दूसरी तरफ समय के साथ उसकी पसंद भी बदल गयी है और इसका प्रमाण  `समर २००७' और `किसान' का बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरने से मिलता है। फ़िल्मों में पुराने माने जा रहे विषय पर बनी इन फ़िल्मों को नये ढांचे में ढालना ज़रूरी है। इसलिए यहां इस विषय के साथ प्रयोग करने की जरूरत महसूस होती है। इन फ़िल्मों की कथावस्तु मजबूत बनाने के साथ इनमें सहजता से पात्रों और परिस्थितियों को मौजूदा समय के हिसाब से अगर प्रस्तुत किया जाये तो दर्शक भी इन फ़िल्मों को देखने में रुचि लेंगे और शायद किसी तरह भारतीय किसान बॉलीवुड में अपनी वापसी कर सकेगा।
हालाँकि अनुष्का रिज़वी द्वारा निर्देशित पीपली लाइव एक हद तक बॉक्स ऑफिस पर हिट रही,  अब दर्शको को इंतजार है किरण राव द्वारा निर्देशित फिल्म '' धोबी घाट '' का. इस फिल्म से कई उमीदे है देखते है यह फिल्म दर्शको पर अपना रंग चढाने में सफल होती है या नहीं ...........

दीपिका

Wednesday, January 19

यादगार फ़िल्में

बीआर चोपड़ा की यादगार फिल्मे ......भारतीय फ़िल्म इतिहास में फ़िल्मकार बीआर चोपड़ा का नाम बड़ा अदब से लिया जाता है. यहाँ मैं उनकी कुछ फिल्मों पर रौशनी डालने जा रही हूँ
बीआर चोपड़ा ने अपनी फ़िल्मों में विधवा पुनर्विवाह, वेश्यावृत्ति जैसे कई विषयों को उठाया.
1957 में आई उनकी फ़िल्म नया दौर में नेहरू काल के आर्दश झलकते हैं तो 1958 में आई साधना वेश्यावृत्ति के मुद्दे पर समाज से सवाल करती नज़र आती है.
गुमराह, हमराज़,क़ानून और निकाह जैसी फ़िल्में का नाम उनकी बनाई फ़िल्मों की सूची में शामिल है.
हालांकि बीआर चोपड़ा की ज़्यादातर फ़िल्में किसी न किसी सामाजिक मुद्दे पर आधारित होती थीं लेकिन इन प्रयोगात्मक फ़िल्मों ने बॉक्स ऑफ़िस पर भी कमाल दिखाया.
नया दौर की कहानी को कई टॉप निर्देशकों ने ठुकरा दिया था लेकिन बीआर चोपड़ा ने रिस्क लिया और फ़िल्म बनाई.
बीआर चोपड़ा के बेटे रवि चोपड़ा ने कहा, "मेरे पिता काम को अंजाम देने में विश्वास रखते हैं. मेरे लिए वो सर्वश्रेष्ठ निर्देशक हैं और रहेंगे."
नया दौर का रंगीन वर्ज़न भी काफी समय पहले  रिलीज़ हो गया  है. आईये धन्यवाद करते है चोपड़ा जी को जिन्होंने समाजिक बुराइयों को फिल्म के रूप में हमारे सम्मुख रखा.   

Tuesday, January 18

सपने हज़ार



इन नन्ही नन्ही आँखों ने सपने हज़ार देखे हैं,
डर है कहीं कोई सपना अखियों से बाहर न छलक जाये...
डर है कहीं ज़माने को पता न चल जाये
डर है कहीं ये मुझसे दूर न हो जाये
ज़माने की कटुता ये सह  न पाएंगे
इतने कोमल हैं कि दर्द सह न पाएंगे
डर है कहीं इनमे खरोच न आ जाये
डर है कहीं लहू लोहान न हो जाये

इतने प्यार और विश्वास के साथ इन्हें संजोया
जैसे माला में मोती पिरोया है
जिस दिन सपनो की ये माला टूटी
समझ लेना मैं जिंदगी से रूठी

किसी के स्पर्श से ये कहीं छू मंतर न हो जाये
इसलिए इन्हें आँखों में पनाह दी है
ये सोच कर कि मेरी अर्थी के साथ
ये भी मिट्टी में  मिल जायेंगे
तब भी राख़ के साथ ये उड़ते जायेगे
इस खुवाइश के साथ .....
शायद अब भी पूरे हो जायेगे.....

Sunday, January 16

दस रुपये का चार सिनेमा

दस रुपये का चार सिनेमा सचमुच मन गदगद हो गया। ज़माने से आम लोगों के मनोरंजन के तौर-तरीके और अधिकार पर रिपोर्ट कर रहा हूं। मल्टीप्लेक्स ने ऐसा धकियाया कि आम आदमी पान के खोमचे में चलरहे सिनेमा को खड़ा हो कर आधा-अधूरा देख काम पर चला जाता है तो कई लोगों ने कई सालों से सिनेमा हॉल में फिल्म ही नहीं देखी। पिछले साल सिनेमा का सिकुड़ता संसार पर रवीश की रिपोर्ट बनाई थी। ये रिपोर्ट www.tubaah.comपर है। पीपली लाइव के सह-निर्देशक महमूद फ़ारूक़ी से बात चल रही थी। हम उम्मीद कर रहे थे कि कहीं न कहीं वीडियो हॉल तो होंगे इस दिल्ली में। उस रिपोर्ट के दौरान नहीं मिला। हां सीमापुरी और लोनी बॉर्डर से सटे एक गांव में एक मल्टीप्लेक्स ज़रूर मिला जहां का अधिकतम रेट ४० रुपये था। वैसे अब मेरे पड़ोस के मल्टीप्लेक्स में गुरुवार को पचास रुपये का टिकट मिल रहा है। मल्टीप्लेक्स वाले औकात पर आ रहे हैं। ख़ैर भूमिका में समय क्यों बर्बाद कर रहा हूं। पहले नज़र पड़ी दिल्ली के एक पुनर्वास कालोनी में लगे इन चार फिल्मी पोस्टरों पर। अजीब से नाम। लोग निहार रहे थे। कैनन के कैमरे से क्लिक करने नज़दीक गया तो ढिशूम ढिशूम की आवाज़ आ रही थी। पर्दा हटाया तो सिनेमा हॉल निकला। कैमरा घुसेड़ दिया। तभी ग़रीब सा मालिक दौड़ा आया कि ये मत कीजिए। दिखा देंगे तो प्रशासनवाले हटा देंगे। सोचिये कि ये ग़रीब लोग कहां जाएगा। जब काम पर नहीं जाता है तो यहीं अपना मनोरंजन करता है। मैंने उसकी बात मान ली और कहा कि मनोरंजन के अधिकार के तहत मेरी नज़र में यह ग़ैरक़ानूनी नहीं है। मैं जगह नहीं बताऊंगा कि कहां देखा। स्टिल लेने दीजिए। भीतर झांक कर देखा तो कोई सौ केक़रीब लोग ज़मीन पर बैठकर सिनेमा देख रहे थे। ठूंसा-ठेला कर। पूरी शांति और शिद्दत के साथ। लंबा सा हॉल। दूर एक टीवी नज़र आ रहा है। हॉलमें स्पीकर की व्यवस्था थी। मालिक ने बताया कि हमारा रेट ग़रीब लोगों के हिसाब से है साहब। दस रुपये में चार सिनेमा या फिर पांच रुपये में दो सिनेमा। जो पांच रुपये देता है उसको दो सिनेमा के बाद बाहर निकाल देते हैं। ये कहां जाएंगे। यहां से शहर इतनी दूर है कि मटरगस्ती के लिए भी नहीं जा सकते। कोई पार्क नहीं है। घर इतना छोटा है कि छुट्टी के दिन कैसे बैठे। बस यहीं चले आते हैं मनोरंजन के लिए। सिनेमा को इसी रेट पर उपलब्ध कराने का मालिक ने जो क्रांतिकारी कार्य किया है वोउनको जवाब है जो चंद लोगों के मुनाफ़े के लिए एंटी पाइरेसी का अभियान चलाते हैं और सरकार से रियायती ज़मीन लेकर मल्टीप्लेक्स बनाते हैं। इस तरह से ठूंसा कर तो मैंने बहुत दिनों से कोई फिल्म ही नहीं देखी है। पीपली लाइव और दबंग में भीड़ देखी थी। आज ही नो वन किल्ड जेसिका नाम की एक ख़राब डॉक्यूमेंट्री देखने गया था। दस लोग थे। आम आदमी को बाज़ार से निकाल कर बाज़ार बनाने वालों को समझ आनी चाहिए कि उनका सिनेमा मल्टीप्लेक्स से बेआबरू होकर उतरता है तो इन्हीं गलियों में मेहनत की कड़ी कमाई के दम पर सराहा जाता है। सरकार को कम लागत वाले ऐसे सिनेमा घरों को पुनर्वास कालोनियों में नियमित कर देनाचाहिए। टैक्स फ्री। पिछले एक महीने से दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में घूम रहा हूं। अजीब-अजीब चीज़ें मिल रही हैं। बिना नाम वाले इस सिनेमा हॉल को देखने के बाद रहा नहीं गया। आज इस सवाल का साक्षात जवाब मिल ही गया कि चाइनीज़ डीवीडी क्रांति के बाद भी वो बड़ी आबादी अपना मनोरंजन कैसे कर रही है जो न तोसेकेंड हैंड टीवी खरीदने की हालत में है न ही चाइना डीवीडी। दस रुपये में चार सिनेमा का रेट। वाह।